राजस्थान की राजनीति में सन्नाटा कभी स्थायी नहीं होता। यहां अक्सर खामोशी के पीछे कोई न कोई राजनीतिक तूफान आकार ले रहा होता है। इन दिनों भी मरुधरा की सियासत कुछ ऐसे ही दौर से गुजर रही है। बाहर से सब कुछ सामान्य दिखाई देता है, लेकिन कांग्रेस के भीतर वर्षों पुरानी खींचतान एक बार फिर सतह पर आती नजर आ रही है। इस बार चिंगारी को हवा दी है प्रदेश की राजनीति के सबसे अनुभवी खिलाड़ी और 'जादूगर' कहे जाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने।
उनके हालिया बयानों ने साफ संकेत दिया है कि राजनीति में न तो रिश्ते पूरी तरह सामान्य होते हैं और न ही पुराने घाव आसानी से भरते हैं।
वह ताज, जो सिर तक पहुंचकर लौट गया
अशोक गहलोत का दर्द केवल राजस्थान की सत्ता गंवाने का नहीं है। उनकी बातों में उस अधूरे अध्याय की टीस भी झलकती है, जब वे कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने की दहलीज तक पहुंच चुके थे। सितंबर 2022 का वह घटनाक्रम आज भी कांग्रेस के इतिहास के सबसे विवादास्पद अध्यायों में गिना जाता है।
गहलोत अब उस पूरे प्रकरण को नए सिरे से परिभाषित करने की कोशिश कर रहे हैं। उनका संदेश स्पष्ट है—उन्होंने कभी आलाकमान की अवहेलना नहीं की, बल्कि यह सब सचिन पायलट के प्रति विधायकों के स्वाभाविक असंतोष का परिणाम था। इस तर्क के जरिए वे एक साथ दो राजनीतिक लक्ष्य साधते दिखाई देते हैं—पहला, अनुशासनहीनता के आरोपों से स्वयं को मुक्त करना और दूसरा, यह जताना कि राजस्थान कांग्रेस में उनकी राजनीतिक पकड़ आज भी बरकरार है।
मानेसर का जिन्न फिर क्यों निकाला गया?
राजनीति में कोई बयान बिना उद्देश्य के नहीं दिया जाता। विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन राजनीतिक शतरंज की बिसात बिछनी शुरू हो चुकी है।
ऐसे में गहलोत द्वारा 'मानेसर प्रकरण' को फिर से उठाना महज अतीत का उल्लेख नहीं माना जा सकता। यह एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है। जब वे कहते हैं कि "गलती इंसान से होती है और पायलट साहब को उसे स्वीकार कर लेना चाहिए", तो यह केवल सलाह नहीं बल्कि राजनीतिक संदेश है।
यह संदेश न सिर्फ सचिन पायलट के लिए है, बल्कि कांग्रेस नेतृत्व और कार्यकर्ताओं के लिए भी है। इसके जरिए गहलोत यह स्थापित करना चाहते हैं कि पार्टी संकट की जड़ आज भी वही घटनाक्रम है, जिसने 2020 में कांग्रेस सरकार को हिलाकर रख दिया था।
'भूलो और माफ करो' का नारा भले कई बार दिया गया हो, लेकिन हकीकत यही है कि दोनों नेताओं के बीच राजनीतिक अविश्वास की खाई अब भी पूरी तरह नहीं भर पाई है।
कार्यकर्ता की दुविधा, दिल्ली की बेचैनी
इस पूरे संघर्ष का सबसे बड़ा असर उस कार्यकर्ता पर पड़ता है, जो जमीन पर पार्टी का झंडा उठाए खड़ा है। जब शीर्ष नेतृत्व के दो प्रमुख चेहरे अलग-अलग राजनीतिक संकेत दें, तो कार्यकर्ताओं के सामने असमंजस की स्थिति पैदा होना स्वाभाविक है।
दिल्ली में बैठे कांग्रेस नेतृत्व के लिए भी यह चुनौती कम नहीं है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी लंबे समय से संगठन में पीढ़ीगत संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं। एक ओर अनुभवी नेतृत्व है, जिसने दशकों तक पार्टी को संभाला है, तो दूसरी ओर युवा नेतृत्व है, जो बदलाव और नए राजनीतिक विमर्श का प्रतीक बनना चाहता है।
लेकिन राजस्थान में यह संक्रमण उतना सहज नहीं दिख रहा, जितना कांग्रेस नेतृत्व चाहता है।
भाजपा की नजर और 2028 की तैयारी
राजस्थान की राजनीति में विपक्ष कभी दर्शक नहीं होता। भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस के भीतर चल रही हर हलचल पर पैनी नजर रखे हुए है। इतिहास गवाह है कि जब भी कांग्रेस आंतरिक संघर्ष में उलझी है, उसका राजनीतिक लाभ भाजपा ने उठाया है।
यही कारण है कि 2028 के विधानसभा चुनाव भले अभी दूर हों, लेकिन कांग्रेस के भीतर नेतृत्व और वर्चस्व की यह लड़ाई अभी से भविष्य की राजनीति की दिशा तय करती दिखाई दे रही है।
क्लाइमेक्स अभी बाकी है...
राजस्थान कांग्रेस की कहानी अभी अपने अंतिम पड़ाव पर नहीं पहुंची है। सवाल केवल इतना नहीं है कि अशोक गहलोत क्या चाहते हैं या सचिन पायलट कितना इंतजार करेंगे। असली सवाल यह है कि क्या कांग्रेस आलाकमान दोनों ध्रुवों के बीच ऐसा संतुलन बना पाएगा, जो पार्टी को एकजुट रख सके।
फिलहाल इतना तय है कि मरुधरा की राजनीति में 'जादूगर' के दांव खत्म नहीं हुए हैं और 'पायलट' ने भी अपनी उड़ान रोकने के कोई संकेत नहीं दिए हैं।
आने वाले वर्षों में राजस्थान कांग्रेस की राजनीति केवल सत्ता की लड़ाई नहीं होगी, बल्कि यह अनुभव और महत्वाकांक्षा, विरासत और परिवर्तन, तथा पुराने प्रभाव और नए नेतृत्व के बीच संतुलन तलाशने की एक बड़ी राजनीतिक कहानी भी होगी।
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