क्या अस्पताल लोगों की जान बचाने के लिए होते हैं या बीमारी फैलाने के लिए? यह सवाल बांसवाड़ा के सबसे बड़े महात्मा गांधी चिकित्सालय की बदहाली को देखकर हर किसी के मन में उठ रहा है। तस्वीरें खुद गवाही दे रही हैं कि यहाँ साफ-सफाई की व्यवस्था पूरी तरह 'भगवान भरोसे' है।

अस्पताल के अलग-अलग वार्डों से निकलने वाले मेडिकल वेस्ट को एक जगह इकट्ठा तो किया गया है, लेकिन इसके निस्तारण के लिए जो वैज्ञानिक तरीका अपनाया जाना चाहिए, उसे पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया है।

नियमों के अनुसार, बायो-मेडिकल वेस्ट को रंगीन थैलियों में अलग-अलग करके नष्ट किया जाना अनिवार्य है, ताकि संक्रमण न फैले। लेकिन यहाँ, इन खतरनाक कचरे के ढेरों को खुले में फेंक दिया गया है। संक्रमित पट्टियां, सुईयां और अन्य मेडिकल वेस्ट के खुले में पड़े होने से स्वस्थ व्यक्ति के भी बीमार होने की पूरी आशंका बनी हुई है।

सबसे बड़ा सवाल ये है कि आखिर अस्पताल प्रशासन सो क्यों रहा है? लगता है जिम्मेदार अधिकारियों ने अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली है, जिसका खामियाजा यहाँ आने वाले मरीजों और आम जनता को अपनी जान जोखिम में डालकर भुगतना पड़ रहा है।

क्या स्वास्थ्य विभाग किसी बड़ी अनहोनी का इंतज़ार कर रहा है? या फिर इन नियमों को धता बताने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई करने की हिम्मत कोई नहीं जुटा पा रहा? बांसवाड़ा का प्रशासन अब भी चुप्पी साधे हुए है, जबकि अस्पताल का परिसर खुद एक बड़े संक्रमण का केंद्र बनता जा रहा है।